कागजों में ही साफ सुथरे हैं उत्तर प्रदेश के गांव!
ग्रामीण विकास की उपलब्धियों के मामले में उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन साफ-सफाई के पैमाने पर वह खरी साबित नहीं हुई हैं। आलम यह है कि 18 करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य से सिर्फ एक दर्जन गांवों को निर्मल ग्राम पुरस्कार के लिए चुना गया है, जबकि 20 जिले वाले हरियाणा जैसे छोटे राज्य के ढाई सौ से भी ज्यादा पंचायतों को निर्मल ग्राम की सूची में जगह मिली है। ग्रामीण सफाई के मामले में उत्तर प्रदेश की यह बदतर स्थिति तब है जब राज्य सरकार ने बीते वर्षो में गांव-गांव में सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति कर दी है। यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों की स्थिति बदतर है। स्वच्छ पेयजल आपूर्ति और पूर्ण स्वच्छता अभियान की परियोजना के लिए केंद्र की ओर से पर्याप्त धन का आवंटन होता है। चयनित 2808 निर्मल ग्राम पंचायतों की सूची में सर्वाधिक महाराष्ट्र 694, मध्य प्रदेश 344, हिमाचल प्रदेश 168 और पंजाब की 51 ग्राम पंचायतें शामिल हैं। चालू वित्त वर्ष में केंद्र ने इस बाबत कुल 13 हजार करोड़ रुपये से अधिक राशि आवंटित की गई, जिसमें राज्यों को हिस्सेदारी लगभग 5 हजार करोड़ रुपये है। पूर्ण स्वच्छता अभियान में अच्छा काम करने वाली ग्राम पंचायतों, ब्लॉक समितियों और जिला परिषदों को निर्मल ग्राम पुरस्कार से नवाजा जाता है। इसके तहत निर्मल ग्राम पंचायतों को 50 हजार से 5 लाख रुपये, ब्लॉक समितियों को 10 से 20 लाख रुपये और जिला परिषदों को 30 से 50 लाख रुपये की पुरस्कार राशि दी जाती है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार उत्तर प्रदेश में पिछले पांच वर्षो में 1132 ग्राम पंचायतों को पूर्ण निर्मल पुरस्कार से नवाजा जा चुका है, लेकिन चालू वर्ष में सिर्फ 12 ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम पुरस्कारों से नवाजा जाएगा। चालू वित्त वर्ष 2010-11 में राज्य को केंद्र से दो हजार करोड़ रुपये का आवंटन किया, जिसमें राज्य को लगभग सात सौ करोड़ रुपये की अपनी हिस्सेदारी जोड़कर प्रस्तावित परियोजनाओं को पूरा करना था। 28 फरवरी 2011 तक 2300 करोड़ रुपये खर्च भी कर दिए गए।
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